श्री पंचमुखी हनुमान जी महाराज – ऐतिहासिक समयरेखा

श्री पंचमुखी हनुमान जी महाराज का यह पावन स्थल श्रद्धा, विश्वास और दिव्य प्रगट्य प्रेरणा की एक अनुपम गाथा अपने भीतर समेटे हुए है। इस मंदिर का इतिहास केवल ईंट-पत्थरों का नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आस्था, साधना और संकल्प की कहानी है।

सन् 1856 – दिव्य प्रगट्य

 

सन् 1856 में श्री सोहनलालजी महाराज के स्वप्न में श्री पंचमुखी हनुमान जी ने दर्शन दिए और कहा—
                   “मेरा यहाँ प्रगट्य हो चुका है, आप मेरी पूजा प्रारंभ करें।”

स्वप्न में जिस स्वरूप के दर्शन हुए, वही स्वरूप उन्होंने पंझरा नदी के किनारे प्रत्यक्ष रूप में देखा। उसी पावन स्थल पर श्रद्धा के साथ पूजा प्रारंभ की गई तथा एक छोटे मंदिर का निर्माण किया गया। यहीं से इस दिव्य यात्रा का आरंभ हुआ।

सन् 1936 – पूजा परंपरा का संरक्षण
 

 

सन् 1936 में श्री सोहनलालजी महाराज के परलोकगमन के पश्चात, उनके परंपरागत उत्तराधिकारी दादागुरु श्री प्रह्लाद जी शर्मा ने श्री पंचमुखी हनुमान जी महाराज की पूजा-अर्चना को निरंतर आगे बढ़ाया और भक्ति परंपरा को सुदृढ़ किया।

सन् 1986 – अधूरा संकल्प

 

 

सन् 1986 में पितागुरु श्री सत्यानारायण जी शर्मा ने मंदिर के जीर्णोद्धार एवं विस्तार का संकल्प लिया।

उनके मन में एक भव्य मंदिर की कल्पना थी, किंतु परिस्थितियों के कारण यह संकल्प उस समय पूर्ण नहीं हो सका और यह स्वप्न अधूरा रह गया।

सन् 2004 – संकल्प को नई दिशा

 

 

सन् 2004 में पितागुरु श्री सत्यानारायण जी शर्मा के परलोकगमन के पश्चात, उनके सुपुत्र श्री शिवप्रसाद जी शर्मा ने अपने पिताजी के अधूरे संकल्प को पूर्ण करने का दृढ़ निश्चय किया।

उनका एक ही भाव था—
“जो स्वप्न मेरे पिताजी ने देखा था, उसे अवश्य पूर्ण किया जाएगा।”

सन् 2006 – भव्य मंदिर निर्माण

 

सन् 2006 में गुरुजी के नेतृत्व में श्री पंचमुखी हनुमान जी महाराज मंदिर के नव निर्माण कार्य का शुभारंभ हुआ।
उस समय अनेक लोगों ने शंका व्यक्त की कि इतना विशाल कार्य कैसे पूर्ण होगा, किंतु गुरुजी का विश्वास अडिग था।

गुरुजी सदैव कहते थे—
“मंत्र जाप और दृढ़ विश्वास।”

इसी अटूट श्रद्धा, निरंतर साधना और श्री पंचमुखी हनुमान जी महाराज की कृपा से एक भव्य एवं दिव्य मंदिर का निर्माण सफलतापूर्वक पूर्ण हुआ।

श्रीपंचमुखी हनुमान मंदिर की महिमा और आस्था निरंतर बढ़ती जा रही है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री देवेंद्र फडणवीस जी ने भी मंदिर में पधारकर भगवान के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इसी प्रकार, परमपूज्य जगतगुरु श्रीरामभद्राचार्य जी भी मंदिर में पधारे और श्रीपंचमुखी हनुमान जी के दर्शन कर आशीर्वाद प्रदान किया। उनके साक्षी में ही अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ।

 

मंदिर में प्रतिवर्ष हनुमान जी का जन्मोत्सव (हनुमान जयंती) अत्यंत श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर भगवान के भव्य श्रृंगार के साथ विभिन्न प्रकार की आकर्षक झांकियाँ सजाई जाती हैं, जैसे कि पुष्प वाटिका, फल वाटिका और अशोक वाटिका आदि, जिनके माध्यम से भक्तगण भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन करते हैं।

वर्ष 2013 में गुरुजी के मन में श्रीपंचमुखी महादेव के निमित्त महारुद्र अनुष्ठान करने का दिव्य भाव उत्पन्न हुआ। उसी भावना से महारुद्र की परंपरा का शुभारंभ हुआ, जो आज एक विशाल धार्मिक आयोजन का रूप ले चुका है। प्रत्येक वर्ष पवित्र श्रावण मास में शुभ मुहूर्त में महारुद्र का भव्य आयोजन किया जाता है, जिसमें हजारों भक्तगण सम्मिलित होकर पूजन और अनुष्ठान में भाग लेते हैं।

 

इस अवसर पर उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर की प्रसिद्ध भस्म आरती की तर्ज पर श्रीपंचमुखी महादेव की भस्म आरती भी प्रारंभ की गई, जो प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक संपन्न होती है। महारुद्र महोत्सव के दौरान एक भव्य शोभायात्रा भी निकाली जाती है, जिसमें हजारों की संख्या में महिला एवं पुरुष भक्त सम्मिलित होकर भक्ति और आनंद के साथ उत्सव मनाते हैं।

आज श्री पंचमुखी हनुमान मंदिर केवल धुले शहर ही नहीं, बल्कि संपूर्ण महाराष्ट्र में भक्तों की आस्था का प्रमुख केंद्र बन चुका है। दूर-दूर से भक्त अपनी मनोकामनाएँ लेकर यहाँ आते हैं और श्रद्धापूर्वक भगवान के दर्शन करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहाँ विराजमान इच्छा-पूर्ति श्री पंचमुखी हनुमान जी अपने भक्तों की सच्ची प्रार्थनाओं को अवश्य पूर्ण करते हैं

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